उत्तराखंड के शुद्धिकरण विवाद के बीच 2024 के संविधान नैरेटिव को फिर धार देने की तैयारी में कांग्रेस, जानिए कैसे? रिपोर्ट- किरनकांत शर्मा
देहरादून: हल्द्वानी में कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की जनसभा के बाद ‘शुद्धिकरण’ को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सिर्फ उत्तराखंड की राजनीति का मामला नहीं रह गया है. कांग्रेस जिस तरह से इस मुद्दे को लगातार राष्ट्रीय स्तर पर उठाकर भुना रही है, उससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि पार्टी इसे एक स्थानीय राजनीतिक विवाद के बजाय दलित सम्मान, सामाजिक बराबरी, संविधान और जातिगत भेदभाव के बड़े सवाल के तौर पर पेश करना चाहती है.
कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को पत्र लिखकर कथित शुद्धिकरण मामले में एफआईआर दर्ज कराने की मांग की है. साथ ही सवाल उठाया है कि घटना के 24 दिन बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं हुई? इससे पहले खड़गे ने राज्यसभा में भी यह मामला उठाया था. वहीं, राहुल गांधी भी दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए इस विवाद को राष्ट्रीय मुद्दे के तौर पर उठा चुके हैं.
ऐसे में कांग्रेस की सक्रियता को केवल उत्तराखंड के आगामी राजनीतिक समीकरण से जोड़कर देखना अधूरा माना जा रहा है. असल सवाल ये है कि क्या कांग्रेस इस पूरे विवाद को उत्तर प्रदेश और पंजाब के बड़े दलित वोट बैंक तक पहुंचाने की तैयारी कर रही है? क्योंकि दोनों ही राज्य में उत्तराखंड के साथ चुनाव होने हैं और दोनों ही जगह पर दलित वोट बैंक किसी को भी सत्ता तक पहुंचाने का दम रखता है.
खड़गे का पत्र बड़ा राजनीतिक संदेश भी: मल्लिकार्जुन खड़गे ने जेपी नड्डा को लिखे पत्र में यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि मामला केवल व्यक्तिगत अपमान या कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर उनके सम्मान का नहीं है. बल्कि, उन करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़ा है, जो सामाजिक भेदभाव की ऐसी परिस्थितियों का सामना करते हैं. खड़गे ने इस मामले को बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के महाड़ सत्याग्रह से जोड़ते हुए ऐतिहासिक संदर्भ भी सामने रखा है. उनका तर्क है कि सामाजिक भेदभव से जुड़े प्रतीकों को केवल एक स्थानीय घटना मानकर छोड़ना उचित नहीं होगा.
दूसरी तरफ लगातार बीजेपी और आयोजन से जुड़े लोगों की ओर से इस आरोप को खारिज किया गया है. यह दावा किया गया है कि मंच की सफाई या हवन का संबंध जातिगत भेदभाव से नहीं बल्कि, गंदगी से था. यानी विवाद का तथ्यात्मक पक्ष अभी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच है, लेकिन कांग्रेस ने जिस तरह इसकी भाषा और संदर्भ तय किया है, उससे साफ है कि पार्टी इसे सामाजिक न्याय के राजनीतिक विमर्श में ले जाना चाहती है. साथ ही उत्तराखंड के हल्द्वानी को प्रयोगशाला के तौर पर कई राज्य में लोगों के बीच इस मुद्दे को रखेगी.
राहुल गांधी की एंट्री ने विवाद को उत्तराखंड से दिल्ली तक पहुंचाया: इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब राहुल गांधी ने भी खुलकर मोर्चा संभाला. हल्द्वानी की घटना को लेकर राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एफआईआर दर्ज कराने की मांग की. जबकि, बाद में इसी मामले में राहुल गांधी के खिलाफ ही उत्तराखंड में एफआईआर दर्ज हो गई. कांग्रेस ने इस एफआईआर को राजनीतिक कार्रवाई बताते हुए विरोध किया है. यही वो घटनाक्रम है, जिसने कांग्रेस को एक और राजनीतिक हथियार दे दिया है.
कांग्रेस अब यह सवाल खड़ा कर सकती है कि जिस घटना को लेकर खड़गे कार्रवाई की मांग कर रहे थे, उस घटना के खिलाफ कार्रवाई के बजाय उस पर सवाल उठाने वाले राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर क्यों हुई? कांग्रेस के लिए यह सवाल उत्तराखंड सरकार और बीजेपी पर हमला करने के साथ-साथ दलित मतदाताओं के बीच व्यापक राजनीतिक संदेश देने का जरिया बन सकता है. यही कारण है कि 7 सितंबर को कांग्रेस देहरादून में एक बड़ा विरोध प्रदर्शन करने जा रही है.
कांग्रेस की नजर अब उत्तराखंड से ज्यादा यूपी और पंजाब पर क्यों? उत्तर प्रदेश की राजनीति को करीब से देखने वाले जानकार ज्ञानेंद्र शुक्ला कहते हैं कि दरअसल इस पूरे विवाद की असली राजनीतिक उपयोगिता उत्तराखंड से ज्यादा उन राज्यों में होगी, जहां दलित मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की ताकत रखते हैं. इनमें सबसे पहले उत्तर प्रदेश और पंजाब आते हैं.
“उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी करीब पांचवें हिस्से से ज्यादा है. राज्य की सीटों में बड़ी संख्या आरक्षित सीटों की है. पंजाब में अनुसूचित जाति की आबादी का अनुपात देश के राज्यों में सबसे ज्यादा है. ऐसे में दोनों राज्यों में दलित वोट किसी भी राजनीतिक दल के लिए केवल एक सामाजिक समूह का वोट नहीं बल्कि, सरकार बनाने और सत्ता के समीकरण बदलने वाला चुनावी फैक्टर हैं.“- ज्ञानेंद्र शुक्ला, राजनीतिक जानकार
राजनीतिक जानकर ज्ञानेंद्र शुक्ला का कहना है कि कांग्रेस यदि हल्द्वानी के विवाद को दलित सम्मान और संविधान की भावना से जोड़ती है, तो उसका लक्ष्य केवल उत्तराखंड के दलित मतदाताओं तक पहुंचना नहीं होगा. बल्कि, उत्तर प्रदेश और पंजाब में अपने लिए राजनीतिक जगह तैयार करना भी हो सकता है.
यूपी में दलित वोट की कहानी समझिए, यहीं से कांग्रेस की रणनीति होती है: उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट का इतिहास बेहद महत्वपूर्ण रहा है. बहुजन समाज पार्टी ने लंबे समय तक इस वोट बैंक को अपनी राजनीतिक ताकत के केंद्र में रखा. मायावती के नेतृत्व में दलित मतदाताओं का बड़ा हिस्सा एक मजबूत राजनीतिक आधार में बदल गया, लेकिन समय के साथ दलित वोट का व्यवहार ज्यादा जटिल हुआ है और अलग-अलग चुनावों में अलग-अलग राजनीतिक दलों को इसका समर्थन मिला है.
साल 2024 के लोकसभा चुनाव में यही बदलाव सबसे ज्यादा चर्चाओं में रहा. बीजेपी की उत्तर प्रदेश में साल 2019 की 62 लोकसभा सीटों से घटकर 2024 में 33 सीटों पर आना और समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन का मजबूत प्रदर्शन, इस बात का संकेत था कि बीजेपी का पिछला सामाजिक समीकरण पहले जैसा प्रभावी नहीं रहा. INDIA गठबंधन की सफलता के पीछे एससी, ओबीसी और मुस्लिम मतदाताओं के व्यापक सामाजिक गठजोड़ को महत्वपूर्ण उस वक्त बताया गया.
2024 में संविधान बदलने का डर बना था बड़ा चुनावी हथियार: यहीं 2024 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस की मौजूदा रणनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है. चुनाव के दौरान विपक्ष ने बीजेपी के 400 पार के नारे को संविधान और आरक्षण के भविष्य से जोड़ते हुए यह नैरेटिव बनाया कि यदि बीजेपी को बहुत बड़ा बहुमत मिला तो संविधान में बदलाव हो सकता है. आरक्षण पर भी खतरा पैदा हो सकता है.
वहीं, बीजेपी ने इस आरोप को खारिज किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत बीजेपी के तमाम नेता संविधान एवं आरक्षण को लेकर विपक्ष के आरोपों को गलत बताते रहे, लेकिन राजनीतिक तौर पर यह मुद्दा खासकर दलित और वंचित तबकों के बीच चर्चा का विषय बना.
चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सीटों में भारी गिरावट और सपा-कांग्रेस गठबंधन के प्रदर्शन को सामाजिक गठबंधन के नजरिए से भी देखा गया. जिसके बाद साफ हो गया कि आरक्षित सीटों पर बीजेपी का प्रदर्शन पिछले चुनाव की तुलना में कमजोर हुआ है. बस यही कारण है कि कांग्रेस जानती है कि अब मायावती यूपी में दलित की मसीहा नहीं है. बीजेपी के करीब रह कर मायावती से ये वोटबैंक कैसे खिसका है? इसका नतीजा 2024 के लोकसभा चुनावों में देश ने भी देखा और यूपी ने भी.
कांग्रेस ने 2024 में जो नैरेटिव बनाया, उसी की अगली कड़ी हो सकता है हल्द्वानी विवाद: कांग्रेस के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक कड़ी है. साल 2024 में कांग्रेस ने राहुल गांधी के नेतृत्व में संविधान, आरक्षण और सामाजिक न्याय को चुनावी मुद्दों के केंद्र में रखा था, तो वहीं अब हल्द्वानी का विवाद कांग्रेस को उसी नैरेटिव को एक नए प्रतीक के साथ आगे बढ़ाने का अवसर दे रहा है.
तब सवाल था संविधान और आरक्षण सुरक्षित रहेंगे या नहीं? अब सवाल बनाया जा सकता है कि संविधान में बराबरी की बात होने के बावजूद सामाजिक भेदभाव की मानसिकता क्यों कायम है? कांग्रेस यदि इन दोनों मुद्दों को जोड़ती है, तो उसका राजनीतिक संदेश सीधे उन वर्गों तक जा सकता है, जिनके लिए संविधान केवल एक दस्तावेज नहीं बल्कि, सामाजिक बराबरी और अधिकारों की गारंटी का प्रतीक है.
“कांग्रेस के लिए यह मुद्दा नहीं है, उससे कई ज्यादा दलित को सम्मान और समान अधिकार देना है. हल्द्वानी का विवाद अकेले पार्टी के अध्यक्ष का अपमान नहीं बल्कि, देश के सभी दलित वर्गों का अपमान है. इसे हम सहन नहीं कर सकते हैं.“- गरिमा दसौनी, कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता, उत्तराखंड
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए यह आसान खेल नहीं: राजनीतिक जानकार ज्ञानेंद्र शुक्ला ये भी कहते हैं कि कांग्रेस के सामने उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि दलित राजनीति पर उसका दावा अभी उतना मजबूत नहीं है, जितना बहुजन समाज पार्टी का ऐतिहासिक आधार रहा है. इसके अलावा समाजवादी पार्टी के साथ उसका गठबंधन भी सामाजिक समीकरणों को प्रभावित करता है.
उनका कहना है कि साल 2024 में कांग्रेस को सपा के साथ गठबंधन का फायदा मिला, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि दलित वोट स्थायी रूप से कांग्रेस के साथ आ गया है. कांग्रेस को अगर हल्द्वानी विवाद का राजनीतिक लाभ यूपी में लेना है, तो उसे सिर्फ बीजेपी पर हमला करने से आगे जाना होगा.
उसे यह साबित करना होगा कि वो दलित समाज के सम्मान, प्रतिनिधित्व, आरक्षण और संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई का स्थायी राजनीतिक विकल्प बन सकती है. यही वो जगह हैं, जहां खड़गे की राष्ट्रीय पहचान कांग्रेस के लिए उपयोगी हो सकती है. वैसे राहुल गांधी लगातार संविधान और दलित की बात कर रहे हैं, इसलिए आने वाले चुनाव में कुछ भी संभव है.
पंजाब में दलित वोट का गणित कांग्रेस के लिए और भी बड़ा: पंजाब में कांग्रेस के लिए तस्वीर और ज्यादा दिलचस्प है. पंजाब में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 32 प्रतिशत है. जो देश के राज्यों में सबसे ज्यादा अनुपातों में से एक है. इसका मतलब ये है कि पंजाब में दलित वोट किसी भी चुनावी रणनीति का केंद्रीय हिस्सा बन सकता है, लेकिन इसके बावजूद राज्य की राजनीति लंबे समय तक मुख्य रूप से जाट, सिख नेतृत्व और अन्य सामाजिक समूहों के आसपास घूमती रही है.
“कांग्रेस ने साल 2021 में चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर दलित नेतृत्व का बड़ा राजनीतिक संदेश दिया था, लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को इसका चुनावी फायदा नहीं मिला. आम आदमी पार्टी ने उस चुनाव में 117 में से 92 सीटें जीतकर सरकार बनाई. जबकि, कांग्रेस 18 सीटों पर सिमट गई. ऐसे में पंजाब कांग्रेस के लिए आने वाले चुनावों में दलित वोट को दोबारा अपने साथ जोड़ना बेहद महत्वपूर्ण होगा.“- नरेंद्र सेठी, राजनीतिक जानकार
पंजाब में खड़गे का मुद्दा कांग्रेस को दे सकता है अलग राजनीतिक स्पेस: नरेंद्र सेठी कहते हैं कि पंजाब में कांग्रेस अगर हल्द्वानी के विवाद को लेकर अभियान चलाती है, तो उसका संदेश उत्तर प्रदेश से थोड़ा अलग हो सकता है. यहां पार्टी ये कह सकती है कि जब आबादी का इतना बड़ा हिस्सा दलित समाज से आता है, तो राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक सम्मान दोनों बराबर होने चाहिए. खड़गे की मौजूदगी इस नैरेटिव को राष्ट्रीय स्तर का चेहरा दे सकती है.
उनका कहना है कि कांग्रेस के लिए ये भी महत्वपूर्ण होगा कि वो पंजाब के स्थानीय दलित नेताओं, रविदासिया और अन्य दलित समुदायों के बीच इस मुद्दे को किस तरह पहुंचाती है. यदि पार्टी इसे केवल उत्तराखंड की घटना न रखकर, पंजाब के स्थानीय सामाजिक सवालों से जोड़ती है, तो इसका राजनीतिक असर कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है. उन्हें लगता है कि कांग्रेस पार्टी ऐसा ही करेगी.
“सबसे बड़ी बात ये है कि सरकार कहें या पुलिस, उन्होंने जो मुकदमा दर्ज किया, ये उल्टा बीजेपी के लिए ही गले की फांस बन जाएगा. भले ही सरकार कहें कि ये कानूनी पहलू है, लेकिन सब जानते हैं कि जहां हत्या, लूट, डकैती पर इतनी जल्दी मुकदमा दर्ज नहीं होता है, वहां ऐसा क्यों किया होगा? ये बड़ी बात है. यही मुद्दा कांग्रेस के लिए संजीवनी है. इस बात को कांग्रेस के बड़े नेता अच्छे से जान रहे हैं.“- नरेंद्र सेठी, राजनीतिक जानकार
बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती, मुद्दे को चुनावी भूगोल बदलकर पेश कर रही कांग्रेस: बीजेपी के सामने इस विवाद में दोहरी चुनौती है. एक तरफ उत्तराखंड में उसे आरोपों का जवाब देना है और दूसरी तरफ कांग्रेस यदि इस मुद्दे को यूपी और पंजाब तक ले जाती है, तो पार्टी को वहां भी इसका राजनीतिक जवाब देना होगा.
हालांकि, बीजेपी पहले ही कांग्रेस के आरोपों को खारिज कर चुकी है और आयोजन से जुड़े लोगों ने भी जातिगत भेदभाव के आरोपों से इनकार किया है, लेकिन राजनीति में कई बार किसी घटना के तथ्य से ज्यादा महत्वपूर्ण ये होता है कि जनता के बीच उसका नैरेटिव क्या बनता है? कांग्रेस इसी नैरेटिव की लड़ाई लड़ती दिखाई दे रही है.
इस पूरे अभियान में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की भूमिकाएं अलग-अलग, लेकिन एक-दूसरे को मजबूत करने वाली हो सकती हैं. राहुल गांधी इस मुद्दे को दिल्ली से राष्ट्रीय राजनीति में उठा रहे हैं. प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं और इसे संविधान एवं सामाजिक न्याय के बड़े सवाल से जोड़ रहे हैं.
वहीं, मल्लिकार्जुन खड़गे अपने व्यक्तिगत अनुभव और सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण इस मुद्दे को दलित सम्मान के सवाल के रूप में ज्यादा प्रभावी ढंग से आने वाले समय में पेश कर सकते हैं. खड़गे का नड्डा को पत्र लिखना इसी राजनीतिक रणनीति की ओर संकेत करता है. उन्होंने साफतौर पर कहा है कि वो इसे व्यक्तिगत शिकायत नहीं बल्कि, व्यापक सामाजिक मुद्दा मानते हैं और कार्रवाई होने तक इस सवाल को उठाते रहने की बात कही है.
2024 का अनुभव कांग्रेस को बता चुका है कि दलित नैरेटिव बदल सकता है चुनाव: कांग्रेस के लिए 2024 का लोकसभा चुनाव एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सबक भी है. उत्तर प्रदेश में बीजेपी के खिलाफ सपा-कांग्रेस गठबंधन का प्रदर्शन इस बात का उदाहरण बना कि अगर दलित ओबीसी और मुस्लिम मतदाताओं के बीच व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार हो जाए, तो बीजेपी का मजबूत चुनावी ढांचा भी प्रभावित हो सकता है.
इसी वजह से कांग्रेस अब शायद यह समझती है कि केवल आर्थिक मुद्दों या सरकार विरोधी नारों से आगे बढ़कर संविधान और सामाजिक सम्मान जैसे भावनात्मक मुद्दे उसके लिए ज्यादा बड़ा राजनीतिक आधार बना सकते हैं. हल्द्वानी विवाद को इसी नजरिए से देखें तो यह कांग्रेस के लिए साल 2024 के संविधान वाले नैरेटिव का एक नया संस्करण तैयार करने का अवसर हो सकता है.